ज़मीन जल चुकी है, आसमान बाकी है
सूखे कुएं तुम्हारा इम्तहान बाकी है
बादलों बरस जाना समय पर इस बार
किसी का मकान गिरवी तो किसी का लगान बाकी है...
जिसने बंजर भूमि को सींचा है, जो देश का अन्नदाता है
क्या वो देश के तिरंगे को झुकने देगा या शर्मशार होने देगा?
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ' जय जवान, जय किसान ' का नारा दिया था।तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इसी नारे को आगे बढ़ाते हुए, ' जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान ' का नारा दिया। हालांकि, गणतंत्र दिवस की जो तस्वीरें हैं, वो साफ साफ बयां करती है कि सरकार की ग्यारहवें दौर की वार्ता के बावजूद, कोई हल न निकालने और चुप्पी साधने के कारण, किसान और जवान आमने सामने नज़र आए।देश के त्योहार में, राष्ट्रीय धरोहर पर फहराए गए मजहबी झंडा, संविधान को तार तार करता नज़र आया।संविधान ने हम सभी नागरिकों को दायित्व दिया है कि अपने राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय गान, और राष्ट्रहित में उठाए गए कदम के खिलाफ अगर कुछ होता है, तो ये सबसे पहले उस नागरिक और देश का अपमान होगा।जिस तिरंगे के लिए एक सैनिक सुदूर पहाड़ियों में देश की रक्षा करता है, अपना सर्वस्व देश को न्योछावर करता है, ये उस सैनिक के लिए भी दुख और दर्द की बात होगी।
वहीं इस आंदोलन के दूसरे पहलू भी निकल कर सामने आते हैं, जिस तरीके से एनआरसी और सीएए का विरोध किया जा रहा था, उसके बाद दिल्ली में हुए दंगे ने, सबके ध्यान को अलग थलग कर दिया।क्या उसी प्रकार ये सरकार की जानबूझकर मंशा थी कि इसे गणतंत्र दिवस तक ले जाया जाए, उसके बाद इन घटनाओं के होने के बाद, कोई किसान कानून को लेकर कोई सवाल नही खड़ा करेगा? किसानों की एकता में फूट पड़ेगी और फिर सभी यूनियन अलग थलग पड़ जाएंगे।अगर, ऐसा है तो ये किसी भी तरीके से स्वीकार करने लायक नहीं।राष्ट्रीय राजधानी में हुए आंदोलन के बावजूद, महामहिम राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जी का कोई ट्वीट भी नहीं आया, क्या ये दर्शाता है कि उन्हें इस विषय की कोई खबर ही नहीं?
दिल्ली पुलिस कमिश्नर के द्वारा किए गए प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि कुछ इनपुट और सूत्रों के हवाले से पता चला था कि 25 जनवरी की शाम और 26 जनवरी की सुबह, किसान अपने तय रूट से नहीं जाने का निर्णय लिए है, तो क्या प्रशासन को, ट्रैक्टर रैली प्रदर्शन को तुरंत प्रभाव से निरस्त नहीं किया जाना चाहिए था?क्या सरकार और प्रशासन, दोनों ही इस आंदोलन का इंतजार कर रही थी? जिससे देश की गरिमा तार तार हो, और फिर इस आंदोलन को किसान में खिलाफ घोषित करके, लोगों को राष्ट्र के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया जाए।अगर इस तरह के आंदोलन राष्ट्रीय राजधानी में हो रहे, तो ये पूरी तरह शर्मशार करने वाली बात है।पहले यह लड़ाई किसान बनाम सरकार थी, लेकिन अब यह सरकार बनाम किसान हो गई है।
वहीं तीसरा पहलू यह भी नजर आ रहा कि किसान के आड़ में विपक्षी पार्टियां अपनी राजनैतिक रोटी सेकने का काम कर रही।हालांकि किसान यूनियन ने किसी भी पार्टी से सहायता लेने को इनकार किया है।जबकि आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी व अन्य राजनैतिक पार्टी के नेता व अध्यक्ष, किसान यूनियन के नेता से संपर्क किए, साथ ही उनके साथ होने का समर्थन भी किया है।
आप अपने विचार कॉमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं
अथवा मेल करें: amanjaiswalniz98@gmail.com



Well Said Aman
ReplyDeleteजय जवान जय किसान यह नारा इतना महत्वपूर्ण है की जब आजाद हुए तभी से नारा हमारे कानों में गूंज रहा है|लेकिन कुछ राजनीतिक और गलत तत्वों की वजह से आज यह नारा गलत साबित होता दिखाई दे रहा है इसका हल यही है की सरकार जवान किसान के बीच सामंजस्य स्थापित हो| I love ❤️ your writing 📝
ReplyDelete