"तुम ग़ज़ब बात करते हो, सपनों की तरह,
कभी हकीकत से गले भी लगाया करो।
खुद भी सोचा कभी क्या सही क्या गलत,
या अपने ही धुन में हो खोए हुए,
कभी जाति और मजहब से ऊपर उठो,
थोड़ा भारत को भारत बनाया करो।"
ये पंक्ति सिर्फ एक राजनैतिक पार्टी के लिए नहीं बल्कि, हम सभी को सही देखने, समझने और भारत की असलियत को पहचानने की ओर मुखातिब करती है...भारत को भारत बनाना है, न न्यूयॉर्क बनाना है और न सिंगापुर बनाना है।
भारत शब्द ही स्वयं को परिभाषित करता है, शांति का प्रतीक, ज्ञान का ओजस, अध्यात्म की भूमि, धर्मो की एकता और संस्कार प्रदत्त।भारत ने अपना तिरंगा, विश्व में अपने ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म से लहराया है।अंग्रेज़ो ने जब भारत को स्वतंत्र किया था, उस समय भारत सिर्फ एक भूमि का टुकड़ा थी।जो भारत कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था, उसे अंग्रेजों ने निचोड़कर, अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए इस्तेमाल किया।भारत की जीडीपी लगभग सत्ताईस फीसद थी, लेकिन जब इसे लूटा गया, जड़ से यहां के सिस्टम को ध्वस्त किया गया, यहां के संपत्ति और खद्दानो को दूसरे देश भेजा गया, तब इसकी जीडीपी लगभग दो फीसद ही बची थी।किसी देश को लूटकर, एक देश का धन दूसरे में लगाने के बाद खुद को विकसित कहना, इससे बड़ी मूर्खता और क्या हो सकती है?
हमारे शिक्षा के क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया गया, जड़ से भारत की संस्कृति और सभ्यता को नष्ट किया जा रहा था।यही कारण है हमें हवाई जहाज के आविष्कार करने वाले का नाम राइट ब्रदर पढ़ाया जाता है, जबकि सच्चाई यह है इसको बनाने वाले भारत के शिवकर बापूजी तलपदे ने आठ वर्ष पूर्व ही आविष्कार कर दिया था।उसी प्रकार से शुश्रु त ने प्लास्टिक सर्जरी का किया है, लेकिन हमें खुद के लोगो पर विश्वास न होने के कारण, इसका फायदा बाहरी लोगों ने उठाया।ताज्जुब की बात है कि हमारे ही ज्ञान को लेकर, वे अपना नाम करते रहे और हम उनको जन्मदाता मानते रहे।
भारत ने हमेशा से समस्त विश्व को शांति और संस्कृति का पाठ पढ़ाया।स्वामी विवेकानंद और अब्दुल कलम जैसे महापुरुषों ने भारत को सींचा और गौरवान्वित किया है।आज भी भारत की अहमियत को पूरा विश्व समझ रहा, किस तरीके से योग को सभी ने अपनाया और दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया।भारत की नीति और नीयत, वासुवधैव कुटुंबकम् को बढ़ावा देना है।आत्मनिर्भर बनने का मंत्र कोई नया नहीं है, बल्कि बापू ने इसे पहले ही स्वदेशी के नाम से शुरुआत कर दी थी।आज, जरूरत है हम अपनी शक्ति और वर्चस्व को पहचाने, इसका सही मार्ग दर्शन करें।
भारत आज भी कर्मो की भूमि है, धर्मो की भूमि है, ये सीता और राम की भूमि है, ये कलाम और इंकलाब की भूमि है।हमें अपनी संस्कृति को पुनः स्थापित करना होगा, जिस तरीके से इस्राएल ने अपने देश में, सभी पुराने चीजों और इतिहास को संग्रहालय में संजो कर रखा है, जिससे कि वहां के लोग उसे जाने, समझे और वाकिफ हो।इसी प्रकार हमें भी, अपने आप को आत्मनिर्भर के साथ साथ, खुद की काबिलियत को पहचाना होगा।वह दिन दूर नहीं, जब भारत एक बार फिर विश्व में नया कीर्तिमान स्थापित करेगा।
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