चार पैसे कमाने मै आया शहर,याद मुझको मेरा गांव आने लगा...
जाहिर सी बात है,स्तिथि इतनी बिगड़ गई है कि लोगो को जीवन के पहिए को चलाने के लिए पलायन करना पड़ रहा है।"क्या... किया जा सकता है जब ऊपर वाले ने पेट दिया है तो जुगाड करना ही पड़ेगा"...यही वक्तव्य होते है रोजमर्रा के कामगारों के...।
किसी भी देश,राज्य या परिवार को सुचारू रूप से चलाने के लिए राजस्व या धन की आवश्यकता होती है।लेकिन जब घर से ही न निकालना हो,जीवन और मृत्यु से संघर्ष ही बचा हो,तो और क्या सोचा जा सकता है।बड़ा सवाल ये कि लॉक डाउन को लगे सिर्फ एक या दो महीने ही हुए है,उससे पहले क्या स्तिथि बेहतर थी?
विश्व की अर्थव्यवस्था भी पिछले साल से सुस्त है,और नतीजतन समूचे देश की प्रगति पर इसका असर देखने को मिला है।वर्ष 2019-20 में भारत की प्रगति की गति लगभग 5.3 मापी गई थी।लेकिन जमीनी स्तर मे पर देखे तो आंकड़ों के विपरित वर्तमान स्तिथि दिखाई देती है।
बेरोजगारी एक ऐसा मुद्दा और ऐसी मियाद है जिसपर युवाओं का भविष्य टिका होता है।शिक्षा के बाद विद्यार्थियों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है।वर्ष 2017-18 में बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत थी,वहीं
वर्ष 2020 अप्रैल माह में 23.1 प्रतिशत बढ़ गई, पिछले माह मई में स्तिथि बद से बदतर हो गई।पिछले पैंतालीस सालों में अब तक का सबसे बुरा दौर बेरोजगारी के मामले में 27.1 प्रतिशत है
अलग अलग एजेंसी के सर्वे के अनुसार भारत की जीडीपी लगभग 1.9 प्रतिशत तय की गई है।लेकिन मूडीज,जो की अमेरिका की एजेंसी है जिसने भारत की जीडीपी को वर्ष 2020-21 में शून्य (ज़ीरो) माना है।सच्चाई सबके सामने है,प्रवासी मजदूरों की भी जो सेविंग्स थी,सब इस लॉक डाउन ने समाप्त कर दिया।
भारत की आधी आबादी युवा से भरी हुई है,लेकिन उनके पास कोई काम नहीं है।जिस युवा के मस्तिष्क का प्रयोग कर देश को वैश्विक मंच पर अपना लोहा मनवाया जाना चाहिए, वहां बेरोजगारी का आलम सातवे आसमान पर है युवा बेरोजगारी दर वर्ष 2007 में 7.19 से बढ़ कर 10.51 वर्ष 2019 में हो गया है।
एक राहत की भी बात है पिछले दिनों ही हरियाणा में लगभग साठ विदेशी कंपनियों ने निवेश के लिए मुख्यमंत्री और अन्य अधिकारियों से बात की है।बताया जा रहा है कि लगभग डेढ़ से दो हजार करोड़ के निवेश होने की संभावना है।हालांकि देखते है आगे आगे होता है क्या...।
जाहिर सी बात है,स्तिथि इतनी बिगड़ गई है कि लोगो को जीवन के पहिए को चलाने के लिए पलायन करना पड़ रहा है।"क्या... किया जा सकता है जब ऊपर वाले ने पेट दिया है तो जुगाड करना ही पड़ेगा"...यही वक्तव्य होते है रोजमर्रा के कामगारों के...।
किसी भी देश,राज्य या परिवार को सुचारू रूप से चलाने के लिए राजस्व या धन की आवश्यकता होती है।लेकिन जब घर से ही न निकालना हो,जीवन और मृत्यु से संघर्ष ही बचा हो,तो और क्या सोचा जा सकता है।बड़ा सवाल ये कि लॉक डाउन को लगे सिर्फ एक या दो महीने ही हुए है,उससे पहले क्या स्तिथि बेहतर थी?
विश्व की अर्थव्यवस्था भी पिछले साल से सुस्त है,और नतीजतन समूचे देश की प्रगति पर इसका असर देखने को मिला है।वर्ष 2019-20 में भारत की प्रगति की गति लगभग 5.3 मापी गई थी।लेकिन जमीनी स्तर मे पर देखे तो आंकड़ों के विपरित वर्तमान स्तिथि दिखाई देती है।
बेरोजगारी एक ऐसा मुद्दा और ऐसी मियाद है जिसपर युवाओं का भविष्य टिका होता है।शिक्षा के बाद विद्यार्थियों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है।वर्ष 2017-18 में बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत थी,वहीं
वर्ष 2020 अप्रैल माह में 23.1 प्रतिशत बढ़ गई, पिछले माह मई में स्तिथि बद से बदतर हो गई।पिछले पैंतालीस सालों में अब तक का सबसे बुरा दौर बेरोजगारी के मामले में 27.1 प्रतिशत है
अलग अलग एजेंसी के सर्वे के अनुसार भारत की जीडीपी लगभग 1.9 प्रतिशत तय की गई है।लेकिन मूडीज,जो की अमेरिका की एजेंसी है जिसने भारत की जीडीपी को वर्ष 2020-21 में शून्य (ज़ीरो) माना है।सच्चाई सबके सामने है,प्रवासी मजदूरों की भी जो सेविंग्स थी,सब इस लॉक डाउन ने समाप्त कर दिया।
भारत की आधी आबादी युवा से भरी हुई है,लेकिन उनके पास कोई काम नहीं है।जिस युवा के मस्तिष्क का प्रयोग कर देश को वैश्विक मंच पर अपना लोहा मनवाया जाना चाहिए, वहां बेरोजगारी का आलम सातवे आसमान पर है युवा बेरोजगारी दर वर्ष 2007 में 7.19 से बढ़ कर 10.51 वर्ष 2019 में हो गया है।
एक राहत की भी बात है पिछले दिनों ही हरियाणा में लगभग साठ विदेशी कंपनियों ने निवेश के लिए मुख्यमंत्री और अन्य अधिकारियों से बात की है।बताया जा रहा है कि लगभग डेढ़ से दो हजार करोड़ के निवेश होने की संभावना है।हालांकि देखते है आगे आगे होता है क्या...।












