क्या हम स्वतंत्र हैं...चाहे सामाजिक, पारिवारिक या फिर अपने मतदान के सन्दर्भ में...अगर नहीं, तो फिर इस धोखे में मत रहिए कि इतनी बड़ी संस्था पारदर्शी, विश्वसनीय और स्वतंत्र होगी....?
सवाल यह है कि स्वतंत्रता के बाद न्यायालय और चुनाव आयोग को स्वतंत्र रखा गया था, क्या आज के समय में वह स्वतंत्रता, पारदर्शिता बरकरार है?जवाब यह नहीं होना चाहिए कि फला पार्टी के समय कौनसी निष्पक्ष थी, बल्कि यह कि आखिर क्यों नहीं हैं?
क्या राजनैतिक फायदा के लिए, सत्ता पर काबिज होने के लिए या फिर कागज़ी लोकतंत्र के बोझ को, ढोने के लिए...।ज़रा सोचिए।
अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा था...
"सरकार, जनता से, जनता के द्वारा और जनता के लिए होनी चाहिए"।मौजूदा हालात में लगता है..."जनता, सरकार से, सरकार के द्वारा और सरकार के लिए है"।
अर्थात सरकार के नजर में, क्या लोकतन्त्र का मतलब, "जनता का वोट लेना और फिर जब वोट मिल जाए, तो मनमाफिक नियम, कानून, बनाकर लागू करना है?
देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद लोगों ने भारत को लोकतांत्रिक तरीके से देश को चलाने का निर्णय लिया था।यही कारण है कि समूचे विश्व में भारत ही सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है।वही दूसरी तरफ चुनाव आयोग और न्यायलय को स्वतंत्र रखा गया, जिससे कि राजनैतिक हस्तक्षेप से बचा जा सके।लेकिन समय समय के अंतराल पर यह संस्थाएं सिर्फ नाम मात्र ही स्वतंत्र रहीं, कई मसलों में निर्णय राजनैतिक पार्टी या फिर राजनेताओं से जुड़े रहे।
पिछले कुछ सालों में चुनाव आयोग पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा होने लगा है, ऐसे में स्वयं चुनाव आयोग को अपनी पारदर्शिता को बनाये रखना, बेहद जरूरी है।समय समय पर चुनाव प्रणाली में उठाए गए सवाल, जहां एक ओर लोकतंत्र की गरिमा को तार तार करते हैं वहीँ दूसरी तरफ लोगों के विश्वास के साथ भी खिलवाड़ करते हैं।हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट ने देश में तेजी से बढ़े संक्रमितों के आकड़े को लेकर चुनाव आयोग को फटकार लगायी हैं।उच्चतम न्यायालय ने यहां तक कहा कि हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए।चूंकि देश में स्थिति बद से बदतर होने के बावजूद, चुनाव आयोग ने किसी भी प्रकार का कोई सख्त निर्णय नहीं लिया, जिससे कोरोना का भीषण विस्फोट हुआ, परिणाम स्वरूप भारत पूरे विश्व में नया महामारी का केंद्र बन गया।
चुनाव आयोग को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि चुनाव के दौरान हो रहे भाषण बाज़ी और चुनावी वादे, जमीनी स्तर पर कितने सफल नजर आते हैं।कुछ ऐसे भी कानून बनाये जाये, जिससे नेतागण और राजनैतिक पार्टियां सिर्फ वादों का अंगूर देकर लोगों से वोट न लें बल्कि वादों के अनुरूप काम भी करें।लेकिन परिणाम स्वरूप वो सभी वादे, पूरे नहीं हो पाते और आम जनता ठगा सा महसूस करती हैं।ऐसे में चुनाव आयोग उन्हीं को अगली बार चुनाव लड़ने की पात्रता दे, जो कि अपने वादों को पूरा किये हो। अन्यथा उस राजनैतिक पार्टी की मान्यता को अगले चुनाव तक रद्द कर दिया जाये।ऐसे में राजनैतिक पार्टियों और नेताओं पर चुनाव जीतने के बाद दबाव रहेगा, जिससे वे विकास करने पर अधिक जोर देंगे।
अक्सर, देखा गया है कि चुनाव जीतने के बाद नेतागण अपने संसदीय औए विधानसभा में नजर नहीं आते।इसको लेकर भी, कानून बनने चाहिए कि न्यूनतम बार अपने संसदीय क्षेत्र व विधानसभा में जाए, वहां की परेशानियों का समाधान करे।इस तरीके से उम्मीद है कि देश प्रगति की दिशा में तेजी से आगे बढ़ेगा।राष्ट्रपति, उच्चतम और सर्वोच्च न्यायालय को इस विषय में सोचना चाहिए।जिससे सच्चे अर्थों में लोकतंत्र सफल होगा और विश्व में उदहारण पेश करेगा।चुनाव आयोग को खुद अपनी पारदर्शिता के विषय में सोचना चाहिए, आखिर क्यों बार बार कटघरे में खड़ा होना पड़ रहा?चाहे ईवीएम को लेकर हो या फिर कोरोना के बीच चुनाव प्रबंधन को लेकर।अगर सवाल उठ रहे, तो कहीं न कहीं समस्या हैं, जिसका जितना जल्दी समाधान हो बेहतर होगा।




