"आवश्यकता ही अविष्कार की जननी होती है।"
इसमें कोई दो राय नहीं कि समय समय पर परिस्थितियों के बदलने से बड़ा बदलाव देखने को मिला है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि समय समय पर परिस्थितियों के बदलने से बड़ा बदलाव देखने को मिला है।
हम विकसित देश जैसा वातावरण तो चाहते है लेकिन,उसके अनुसार काम नहीं करते।भारत में नोटबंदी के दरम्यान, लोगों के पास एक मात्र विकल्प था ऑनलाइन लेने - देन की प्रक्रिया को अपनाना। यहीं कारण है आज इतने लंबे स्तर पर ऑनलाइन पर जोर दिया जा रहा है।
इसी प्रकार से जब हम 21 वी सदी में हैं, तो जरूरत है उसके अनुसार सोचे,समझे और व्यवहार करें।
ऑनलाइन को अब हर वर्ग के लोगों ने अपने असल जिंदगी का एक अभिन्न अंग बना लिया है।ऑनलाइन परीक्षा कराना भी स्वागतयोग्य है।लेकिन उससे पूर्व इस बारे में अवश्य विचार करने की आवश्यकता है कि हर इकाई के पास बेहतर नेटवर्क और सहज पहुंच हो।
ऑनलाइन को अब हर वर्ग के लोगों ने अपने असल जिंदगी का एक अभिन्न अंग बना लिया है।ऑनलाइन परीक्षा कराना भी स्वागतयोग्य है।लेकिन उससे पूर्व इस बारे में अवश्य विचार करने की आवश्यकता है कि हर इकाई के पास बेहतर नेटवर्क और सहज पहुंच हो।
इस महामारी के दौरान लोगों की आजीविका का साधन समाप्त हो गया। बच्चों ने जीवन की रक्षा के लिए,कितने डर और तनाव को झेला है।ऐसे में ऑनलाइन परीक्षा की व्यवस्था करना, बच्चो के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
ये जरूर नेक पहल है कि डिजिटल इंडिया के अन्तर्गत परीक्षाओं को ऑनलाइन प्रक्रिया से लिया जाए,लेकिन बुनियादी जरूरतों को भी संज्ञान में लेना होगा। जिसके,परिणामस्वरूप सभी बच्चे इसमें सम्मलित हो सकें,और पारदर्शिता के साथ इसको सकारत्मक अंजाम दिया जा सके।
जिस तरीके का प्रस्ताव दिल्ली विश्वविद्यालय ने रखा है,उससे ये साफ पता चलता है,किस तरीके से शिक्षा को भार समझ कर, अनान - फानन में करा कर सर का बोझ हल्का किया जा रहा है।इस तरीके से शिक्षा के महत्व और तवज्जो को भी सीधे तौर पर चुनौती देने का कार्य किया जा रहा।इसका अंजाम देश के लिए घातक साबित हो सकता है। बच्चे ही देश को नई ऊंचाई दिला सकते है ऐसे में उनकी शिक्षा के साथ ये व्यवहार...क्या ऐसे ही बनेगा आत्मनिर्भर भारत?


